अज्ञात की ओर Aghori Secrets

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अज्ञात की ओर Aghori Secrets

agyat ki aur

अज्ञात की ओर केवल अति साहसिक व्यक्ति ही जा सकते हैं, पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा चाहिये । तभी अनन्त की ओर अज्ञात में जाया जा सकता है । जितना समर्पण उतनी ही ऊँची उड़ान ।

अज्ञात की ओर केवल अति साहसिक व्यक्ति ही जा सकते हैं, पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा चाहिये । तभी अनन्त की ओर अज्ञात में जाया जा सकता है । जितना समर्पण उतनी ही ऊँची उड़ान । अहंकार को जाने बगैर कोई भी अहंकार से मुक्त नही हो सकता । जो अहंकार से मुक्त नही वो कभी भी चाहकर भी समर्पण नही कर पायेगा । ओर बिना समर्पण के कोई भी परम् आनन्द में प्रवेश नही कर सकता । अध्यात्म के हजारों मार्ग है सभी मार्ग अंत में परम् आनन्द में पहुचते हैं । सभी मार्गो में एक ही समानता है । सभी के अंत में व्यक्ति का अहंकार समाप्त हो जाता है । अहंकार के समाप्त होने पर ही व्यक्ति में पूर्ण समर्पण का भाव जन्म लेता है । उसका बोध जाग जाता । तभी वो चाहे किसी भी मार्ग से आया हो । परम् आनन्द में प्रवेश कर जाता है । परम् आनंद ही मनुष्य जन्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है । ये संसार एक भयंकर चक्रव्यू है चाहकर भी, बहुत कोशिश करके भी इंसान इस चक्रव्यू से बाहर नही आ पाता । बहुत कम ही ऐसे साहसिक होते जो पूर्ण समर्पण से इस चक्रव्यू का अतिक्रमण कर जाते हैं । और परमात्मा के दूसरी पारलौकिक दुनिया में प्रवेश कर जाते है ।
कैसे पाये अहंकार से मुक्ति……..
होश (बोध) के पूर्णत परिपक्व होने पर अहंकार की न्यूनता हो जाती । होश की पूर्णता पर अहंकार से मुक्ति हो जाती । जब आप अपने आप को केवल ऊर्जा अनुभव करने लगों । तो आप जान सकते है कि अब अहंकार न रहा । क्योकि अहंकार की शून्यता पर केवल शुद्ध ऊर्जा ही शेष रह जाती है । केवल एक बोध रह जाता । केवल होश की पूर्णता रह जाती । कैसे इस मार्ग पर आगे बढ़े । ध्यान की अनेको विधियाँ है इनमे से अपने अनुरूप किसी भी एक विधि का प्रयोग जो की आपके अनुकूल हो का प्रयोग किया जा सकता है । ध्यान की विधिया होश (बोध) की शक्ति को बढ़ाने का ही काम करती हैं । ध्यान की अनन्त गहराई एक पूर्ण या पूर्णतः परिपक्व होश (बोध) को जन्म देती है । बोध हो जाने पर आप अपने शरीर को अपने आप से प्रत्यक्ष रूप से बिलकुल अलग अनुभव कर पाएंगे । अपने आप को शरीर मान लेना ही अहंकार है । और शरीर को अपने आप से अलग अनुभव कर लेना ही अहंकार से मुक्ति है ।
क्या है समर्पण………..
अध्यात्म के जगत का सबसे बड़ा सूत्र है समर्पण । समर्पण मतलब पूर्ण स्वीकार जो भी होगा, जीवन में अच्छा या बुरा सब मुझे स्वीकार है । एक दुःसाहस चाहिये फिर बिना कुछ करे ही भाव करते ही जीवन में क्रांति घटित होती है । कुछ भी घटे जीवन में पूर्ण स्वीकार । जो हो रहा है उसे देखते रहिये । ये न सोचो ये ठीक हुआ, ये न सोचो ये गलत हुआ, जो हुआ बस उसे देखो, किसी भी अच्छी या बुरी घटना के प्रति कोई भी प्रतिक्रिया नही । सात दिन अपने आप को पूरी तरह से परमात्मा को सौफ दो ये एक प्रयोग करके देखिये । पूरा का पूरा जीवन परिवर्तित हो जायेगा । असीम आनन्द दिन प्रतिदिन बढ़ता जायेगा । अपनी सारी चिंताओं को ईश्वर को समर्पित कर दो । अपने आप को पूर्णतः ईस्वर को समर्पित कर दो । पूर्ण समर्पण कर ये मत सोचो की क्या होगा । पूर्ण समर्पण करो अपने आप का । पूर्ण समर्पण करते ही अनन्त आनंद, या ध्यान की घटना अपने आप घटने लगेगी । फिर किसी भी ध्यान विधि की जरूरत नही । सौफ दो अपने आप को परमात्मा के हाथों में । अगर जरा सा भी, इंच भर भी कुछ सोचा, तो ये फिर समर्पण नही । इंच भर भी कुछ न सोचो, पूर्ण समर्पण में ध्यान की घटना अपने आप घटने लगती है । कुछ भी सोचने का मतलब की अभी समर्पण नही हुआ है । पूर्ण समर्पण जीवन का सबसे बड़ा सूत्र है । समर्पण करते ही, उसी समय तुरन्त ही असीम आनन्द भीतर बढ़ता ही चला जायेगा । पूर्ण समर्पण में ही परमात्मा की महान कृपाओं का पता चलता है । पूर्ण समर्पण मे है परम् आनन्द । पानी में नया नया तैरना सीखता है वो पहले तो बहुत ही डरता है । नदी में किनारे किनारे अपना सिर भिगाकर वापस आ जाता है । फिर धीरे धीरे कुछ डुबकी लगाता है । नदी के बीच में जाने से बहुत ज्यादा डरता है । जरा भी हिम्मत नही कर पाता । धीरे धीरे और प्रयास करता, कभी पानी में डूब भी जाता । फिर घबरा जाता, कुछ तो डर की वजह से फिर सीखना व जोखिम लेना छोड़ ही देते हैं । लेकिन कुछ साहसी फिर भी लगातार डूबकर व अनेक प्रयोग करके अंत में तैरना सीख ही लेते है । जब ये ठीक से तैरना सीख जाते है फिर तो ये इसमें इतने कुशल हो जाते है कि बड़ी बड़ी नदियों में भी बड़ी ऊँचाई से कूदकर तैर लेते हैं । कुछ तो बहुत देर तक नदी में सारे शरीर को ढीला छोड़कर वैसे ही पड़े रहते हैं बिना किसी फ़िक्र के । ये वो ही लोग हैं जो कभी तैरने से अत्यधिक डरते थे । लेकिन आज विश्वास अपने चरम पर है । इसलियेथोडी भी संदेह नही थोडा भी कोई डर नही । पड़े हैं नदी की धारा में शरीर तैर रहा है । बड़ा आनन्द ले रहे हैं तैरने का । ठीक ऐसा ही समर्पण में है जो ठीक से समर्पण में डूबना जान जाता है । वो सबकुछ परमात्मा के चरणों में सौप कर मस्त होकर संसार में जीता है । जो जान जाता है उसकी कृपा को । फिर उसके भीतर थोडा भी संदेह नही,थोडा भी डर नही । जरा भी किसी बात की कोई फ़िक्र नही । सबकुछ अज्ञात के सहारे छोड़कर केवल वर्तमान में जीता है । मात्र साक्षी भाव से संसार की घटनाओं को देखते रहता है । जैसे हम फिल्म को पर्दे पर देखते है वो भी ठीक इसी प्रकार जीवन की हर घटना व अपने भीतर चल रहे विचारो को भी जीवन के पर्दे पर देखना शुरू कर देता है । संसार की हर घटना हर विचार से वो पूर्णतः अपने को अलग कर लेता है । सबकुछ देखता है हर घटना को देखता है । संसार की हर घटना, भीतर चल रहे विचार से वो हमेशा ही अपने आप को पृथक अनुभव करता है । बाहर तो संसार है संसार के विचार हैं लेकिन भीतर असीम आनन्द की धारा लगातार अनुभव करता है । बाहर संसार की उथल पुथल, बाहर खुद के विचार की उथल पुथल, लेकिन भीतर असीम आनन्द । बाहर बिलकुल अलग हो गया, भीतर असीम आनंद बह रहा । आपने भीतर के अनन्त आनंद में जी रहे । ये जो अपने आप से अलग संसार को देखने का ढंग है । ये ही बोध है । ये बोध जितना ज्यादा परिपक्व होगा । ये संसार, ये शरीर, इस शरीर की हर क्रिया, इस शरीर के लगातार चल रहे विचार, और भी साफ साफ दिखाई देंगें । दूर से बस इन्हे देखना ही है । बस देखना ही है, जब हम इन्हें देखना शुरू करेंगें । तो ये भी जान जायेंगे की हम शरीर नही, हम विचार नही, हम तो इससे पूर्णतः अलग है । जब ये बोध हो जाता की हम पूर्णतः अलग है । इस बोध की अग्नि में ही अहंकार जलकर भस्म हो जाता है । अपने आप को शरीर मान लेना अहंकार है । अपने आप को शरीर से अलग जान लेना ही अहंकार से पूर्ण मुक्ति है । बोध होते ही की मैं शरीर नही अहंकार हमेशा के लिये स्वतः ही समाप्त हो जाता है । अहंकार समाप्त करना नही पड़ता । बोध के होते ही अहंकार हमेशा के लिये तिरोहित हो जाता है । अहंकार तो केवल बोध की कमी के कारण, दूसरो शब्दो में बोध न होने के कारण होता है ।

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