sadhak ka man or yogyata

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sadhak ka man or yogyata

किसी भी सैद्धांतिक साधना के लिए साधक को न्यूनतम डेढ़ से दो घंटे तक के स्थिर आसन पर पूर्ण एकाग्रता व साधना काल में ब्रह्मचर्य का अभ्यास होना अनिवार्य होता है !

साधक के लक्षण व योग्यताएं

किसी भी सैद्धांतिक साधना के लिए साधक को न्यूनतम डेढ़ से दो घंटे तक के स्थिर आसन पर पूर्ण एकाग्रता व साधना काल में ब्रह्मचर्य का अभ्यास होना अनिवार्य होता है

ऐसा व्यक्ति जो वेद, शास्त्र, ईश्वर, माता, पिता, गुरु, मानवता, राष्ट्र, त्याग, स्वाध्याय, सेवा व धर्म में पूर्ण निष्ठा रखता हो, तथा अत्यंत सहजता पूर्वक इन सब की अवस्थाओं का पालन व सेवा करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति श्रेष्ठ शिष्य व साधक बन सकता है

वहीँ ऐसा व्यक्ति जो वेद, शास्त्र, ईश्वर, माता, पिता, गुरु, मानवता, राष्ट्र, त्याग, स्वाध्याय, सेवा व धर्म में निष्ठा न रखता हो, तथा आवश्यकता पड़ने पर इन सब की अवहेलनाएं, निंदा करने व निंदा सुनने में सक्षम हो, वह व्यक्ति कभी शिष्य व साधक नहीं बन सकता है

ऐसा व्यक्ति जो सात्विक आहारी, सत्यभाषी, अपने कुल के संस्कारों, गुरु के संस्कारों, लोक लज्जा, मान मर्यादा का अत्यंत सहजता पूर्वक पालन करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति श्रेष्ठ शिष्य व साधक बन सकता है

वहीँ ऐसा व्यक्ति जो सात्विक आहारी, सत्यभाषी, अपने कुल के संस्कारों, गुरु के संस्कारों, लोक लज्जा, मान मर्यादा का सहजता पूर्वक पालन करने में सक्षम न हो, तथा आवश्यकता पड़ने पर इन सब की अवहेलनाएं करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति कभी शिष्य व साधक तो क्या एक अच्छा नागरिक भी नहीं बन सकता है

ऐसा व्यक्ति जो माता, पिता व गुरु के सम्मुख मान मर्यादा का पालन करे, दरिद्रासन (दोनों घुटनों को हाथ से बांधकर) में न बैठे, माता, पिता व गुरु के सम्मुख पैर लम्बे फैलाकर न बैठे, हाथों की अँगुलियों को न चटकाए, बात को पहले पूरा सुने व समझे फिर अपनी बात कहे, माता, पिता व गुरु के बताए दिशा निर्देशों का अत्यंत सहजता पूर्वक पालन करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति श्रेष्ठ शिष्य व साधक बन सकता है

वहीँ ऐसा व्यक्ति जो माता, पिता व गुरु के सम्मुख मान मर्यादा की अवहेलना, दरिद्रासन (दोनों घुटनों को हाथ से बांधकर) में बैठे, माता, पिता व गुरु के सम्मुख पैर लम्बे फैलाकर बैठे, हाथों की अँगुलियों को चटकाए, बात को पूरा सुने बिना मध्य में अपनी बात कहे, माता, पिता व गुरु के बताए दिशा निर्देशों की अवहेलना करता हो, वह व्यक्ति कभी शिष्य व साधक नहीं बन सकता है ! क्योंकि यह सभी नकारात्मक, प्रतिरोधक, अग्राह्यता व कुपात्रता के लक्षण हैं

ऐसा व्यक्ति जो गुरु के बताए दिशा निर्देशों, साधना विधान, नियम व कर्तव्यों का अत्यंत सहजता पूर्वक अक्षरशः पालन करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति श्रेष्ठ शिष्य व साधक बन सकता है

वहीँ ऐसा व्यक्ति जो गुरु के बताए दिशा निर्देशों, साधना विधान, नियम व कर्तव्यों का अत्यंत सहजता पूर्वक अक्षरशः पालन करने में सक्षम न हो, वह व्यक्ति कभी शिष्य व साधक नहीं बन सकता है

क्योंकि जो व्यक्ति गुरु के बताए दिशा निर्देशों, साधना विधान, नियम व कर्तव्यों में अपने अनुसार संशोधन करता है, तो क्या वह इतना सक्षम है कि उसको गुरु के बताए विधान में मनमाना संशोधन करके सफलता मिल ही जाएगी, जो अनुभवी गुरु द्वारा प्रदत्त विधान से नहीं मिलेगी ??? यदि वह इतना ही सक्षम है तो फिर उसको गुरु की आवश्यकता ही क्यों पड़ी है ? शिष्य होने का दिखावा मात्र इसलिए होता है क्या “कि साधना विधान में मनमाना संशोधन करके साधना में असफल होकर अपनी असफलता तथा बहुमूल्य समय, सामग्री व धन के व्यय का दोष गुरु के सिर मढ़ दिया जाए ? यदि ऐसा है, तो ऐसे विद्वान व्यक्तियों को निगुरा रहना ही अच्छा होता है, और वर्तमान में अधिकतर साधक इसी रोग से ग्रस्त मिलते हैं कि बस एक बार गुरु दीक्षा दे दे फिर तो कौन गुरु और कैसे नियम

ऐसा व्यक्ति जो माता, पिता व गुरु के संस्कारों, आज्ञा, निर्देश, नियमों, प्रतिबंधों, मान मर्यादा का अत्यंत सहजता पूर्वक पालन करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति श्रेष्ठ शिष्य व साधक बन सकता है

वहीँ ऐसा व्यक्ति जो माता, पिता व गुरु के संस्कारों, आज्ञा, निर्देश, नियमों, प्रतिबंधों, मान मर्यादा का सहजता पूर्वक पालन करने में सक्षम न हो, तथा आवश्यकता पड़ने पर इन सब की अवहेलनाएं करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति कभी शिष्य व साधक नहीं बन सकता है, क्योंकि माता, पिता व गुरु के द्वारा निर्धारित संस्कार, आज्ञाएं, निर्देश, नियम, प्रतिबंध व मर्यादाएं उस व्यक्ति के व्यक्तित्व व योग्यता के निर्माण के लिए होती हैं न कि उसको अनावश्यक बाध्य करने के लिए

ऐसा व्यक्ति जो माता, पिता, गुरु व श्रेष्ठजनों के आसन, शैय्या व उनके सामानांतर आसन का प्रयोग नहीं करने, तथा माता, पिता, गुरु व श्रेष्ठजनों के बाएँ, सम्मुख या पैरों की और व उनके आसन, शैय्या से नीचे आसन पर स्थित हो कर सहजता से वार्ता करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति अहैतुक ही अनेक योग्यताओं व ज्ञान को प्राप्त करते हुए श्रेष्ठ शिष्य, साधक व ज्ञाता बन सकता है ! क्योंकि किसी के भी बाएँ, सम्मुख या पैरों की और व उनके आसन, शैय्या से नीचे आसन पर आते ही दोनों व्यक्तियों के शरीर की चुम्बकीय ऊर्जा व गुरुत्व शक्ति अनुगामी हो जाती है, और ऊर्जा के इस प्रभाव से दूसरा व्यक्ति स्वतः ही प्रदाता बन जाता है और आप स्वतः ही ग्राह्य व प्रभावमय बन जाते हैं, ओर उनसे अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकते हैं

वहीँ ऐसा व्यक्ति जो किसी के भी आसन, शैय्या व उसके सामानांतर आसन का प्रयोग करने, तथा जो किसी के भी दाहिने, पीठ पीछे या सिराहने की और स्थित हो कर वार्ता करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति कभी शिष्य, साधक व ज्ञाता नहीं बन सकता है ! क्योंकि किसी के भी सामानांतर आसन, शैय्या, दाहिने, पीठ पीछे या सिराहने की और आते ही दोनों व्यक्तियों के शरीर की चुम्बकीय ऊर्जा व गुरुत्व शक्ति समानांतर हो जाती है, और ऊर्जा के इस प्रभाव से दूसरा व्यक्ति स्वतः ही प्रतिरोधक बन जाता है और आप स्वतः ही अग्राह्य व प्रभावहीन बन जाते हैं, इस स्थिति में यदि दूसरा व्यक्ति आपको कुछ देना भी चाहे तो भी उसके भीतर से वह शब्द व ऊर्जा शक्ति स्वतः ही नहीं निकल सकेंगे जिनकी आपको आवश्यकता है, इस कारण से इस अवस्था में कोई भी किसी से कुछ प्राप्त नहीं कर सकता है

ऐसा व्यक्ति जो माता, पिता, गुरु व श्रेष्ठजनों के सम्मुख हृदय से पारदर्शी व सत्यभाषी हो कर सहजता से वार्ता करने में सक्षम हो, वह व्यक्ति अपने अभीष्ट को अवश्य प्राप्त कर सकता है

वहीँ ऐसा व्यक्ति जो माता, पिता, गुरु व श्रेष्ठजनों के सम्मुख हृदय से पारदर्शी व सत्यभाषी न हो कर सहजता से वार्ता करने में सक्षम न हो व असत्य बोलकर अथवा रोने जैसे भावनात्मक प्रभाव के सहारे पर कुछ प्राप्त करना चाहता हो, तो वह व्यक्ति कभी भी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर सकता है ! क्योंकि कोई भी सक्षम गुरु आपके शब्दों व प्रदर्शन को नहीं बल्कि आपकी वास्तविक भावनाओं, मानसिक ऊर्जा व पात्रता का अध्ययन करके ही आपको कुछ दे सकता है ! और कोई भी सक्षम गुरु कभी भी शब्दों, छल, असत्य, धन या भावनात्मक प्रभाव के जाल में फंसकर पात्रता के बिना कभी किसी को कुछ नहीं देगा

जय श्री कृष्णा

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