संग का रंग लगता ही है या कि यह…

🙏!! प्रकृति संतुलन मांगती है !!🙏
April 16, 2019

संग का रंग लगता ही है या कि यह…

भगवान, संग का रंग लगता ही है या कि यह केवल संयोग मात्र है? कृपा कर समझावें! ओशो:- राजेंद्र भारती, सब तुम पर निर्भर है। वर्षा होती हो और तुम छाता लगा कर खड़े हो जाओ, तो भीगोगे नहीं। छाता बंद कर लो, और भीग जाओगे। वर्षा होती हो, तुम छिद्र वाला घड़ा ले जाकर आकाश के नीचे रख दो; भर भी जाएगा और फिर भी खाली हो जाएगा। छिद्र बंद कर दो, भरेगा और भरा रह जाएगा। वर्षा होती हो, छिद्रहीन घड़े को भी आकाश के नीचे ले जाकर उलटा रख दो; तो वर्षा होती रहेगी और घड़ा खाली का खाली रहेगा। सब तुम पर निर्भर है। सदगुरु तो वर्षा है–अमृत की वर्षा! तुम लोगे तो तुम्हारे प्राणों को रंग जाएगा। तुम न लोगे, द्वार-दरवाजे बंद किए बैठे रहोगे, तो चूक जाओगे। तुम पूछ रहे हो: “संग का रंग लगता ही है या कि यह केवल संयोग मात्र है?’ अनिवार्यता नहीं है और संयोग भी नहीं। संग का रंग लगता ही होता, तब तो जो भी सदगुरु के पास आ जाता उसी को रंग लग जाता। फिर तो जिन्होंने जीसस को सूली दी, वे सूली देते-देते रंग गए होते। फिर तो जिन्होंने बुद्ध को पत्थर मारे, वे पत्थर मारते-मारते रंग गए होते। संग का रंग लगे ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। ऐसी अनिवार्यता..

भगवान,
संग का रंग लगता ही है या कि यह केवल संयोग मात्र है? कृपा कर समझावें!

ओशो:-
राजेंद्र भारती, सब तुम पर निर्भर है। वर्षा होती हो और तुम छाता लगा कर खड़े हो जाओ, तो भीगोगे नहीं। छाता बंद कर लो, और भीग जाओगे। वर्षा होती हो, तुम छिद्र वाला घड़ा ले जाकर आकाश के नीचे रख दो; भर भी जाएगा और फिर भी खाली हो जाएगा। छिद्र बंद कर दो, भरेगा और भरा रह जाएगा। वर्षा होती हो, छिद्रहीन घड़े को भी आकाश के नीचे ले जाकर उलटा रख दो; तो वर्षा होती रहेगी और घड़ा खाली का खाली रहेगा। सब तुम पर निर्भर है।
सदगुरु तो वर्षा है–अमृत की वर्षा! तुम लोगे तो तुम्हारे प्राणों को रंग जाएगा। तुम न लोगे, द्वार-दरवाजे बंद किए बैठे रहोगे, तो चूक जाओगे।
तुम पूछ रहे हो: “संग का रंग लगता ही है या कि यह केवल संयोग मात्र है?’
अनिवार्यता नहीं है और संयोग भी नहीं। संग का रंग लगता ही होता, तब तो जो भी सदगुरु के पास आ जाता उसी को रंग लग जाता। फिर तो जिन्होंने जीसस को सूली दी, वे सूली देते-देते रंग गए होते। फिर तो जिन्होंने बुद्ध को पत्थर मारे, वे पत्थर मारते-मारते रंग गए होते।
संग का रंग लगे ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। ऐसी अनिवार्यता तो जगत में किसी चीज की नहीं है। आग भी तभी जलाएगी जब तुम हाथ डालोगे। हाथ तुम दूर रखो, आग नहीं जलाएगी। आग जलती रहेगी। आग अपने को जलाती रहेगी। मगर अगर हाथ डालोगे तो जलोगे।
सदगुरु के पास आओगे तो रंग लगेगा। हाथ डालोगे तो जलोगे। प्राण डाल दोगे तो जो भी व्यर्थ है, कूड़ा-कर्कट है, सब कचरा हो जाएगा; सोना निखर आएगा।
और यह संयोग मात्र भी नहीं है। संयोग मात्र का तो अर्थ है: कभी हो जाए, कभी न हो। हो जाए तो हो जाए, न हो तो न हो; कोई नियमबद्धता नहीं है। ऐसा भी नहीं है।
आग में हाथ का जलना संयोग मात्र नहीं है। आग में हाथ डालोगे तो जलोगे ही, नियम से जलोगे। ऐसा नहीं कि कभी जलो और कभी न जलो। कभी आग कहे कि आज दिल ही जलाने का नहीं है। और कभी कहे कि आज जरा दूर ही रहना, आज दुगना जलाऊंगी। संयोग नहीं है आग में हाथ डाल कर जलना और अनिवार्यता भी नहीं है। क्योंकि अनिवार्यता होती तो तुम कहीं भी होते तो जल जाते। दूर खड़े रहते तो भी जल जाते।…

ओशो ✍उत्सव आमार जाति आनंद आमार गोत्र-प्रवचन-०१

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