March 27, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र विधि–110 (ओशो)

दूसरी विधि: ‘हे गरिमामयी, लीला करो। यह ब्रह्मांड एक रिक्‍त खोल है जिसमें तुम्‍हारा मन अनंत रूप से कौतुक करता है।’ यह दूसरी विधि लीला के आयाम पर आधारित है। इसे समझे। यदि तुम निष्‍क्रिय हो तब तो ठीक है कि तुम गहन रिक्‍तता में, आंतरिक गहराइयों में उतर जाओ। लेकिन तुम सारा दिन रिक्‍त नहीं हो सकते और सारा दिन क्रिया शून्‍य नहीं हो सकते। तुम्‍हें कुछ तो करना ही पड़ेगा। सक्रिय होना एक मूल आवश्‍यकता है। अन्‍यथा तुम जीवित नहीं रह सकते। जीवन का अर्थ ही है सक्रियता। तो तुम कुछ घंटों के लिए तो निष्‍क्रिय हो सकते हो। लेकिन चौबीस घंटे में बाकी समय तुम्‍हें सक्रिय रहना पड़ेगा। और ध्‍यान तुम्‍हारे जीवन की शैली होनी चाहिए। उसका एक हिस्‍सा नहीं। अन्‍यथा पाकर भी तुम उसे खो दोगे। यदि एक घंटे के लिए तुम निष्‍क्रिय हो तो तेईस घंटे के लिए तुम सक्रिय होओगे। सक्रिय शक्‍तियां अधिक होंगी और निष्‍क्रिय में जो तुम भी पाओगे वे उसे नष्‍ट कर देंगे। सक्रिय शक्‍तियां उसे नष्‍ट कर देंगी। और अगल दिन तुम फिर वही करोगे: तेईस घंटे तुम कर्ता को इकट्ठा करते रहोगे और एक घंटे के लिए तुम्‍हें उसे छोड़ना पड़ेगा। यह कठिन होगा।..
March 27, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र विधि–111 (ओशो)

तीसरी विधि: ‘हे प्रिये, ज्ञान और अज्ञान, अस्‍तित्‍व और अनस्‍तित्‍व पर ध्‍यान दो। फिर दोनों को छोड़ दो ताकि तुम हो सको।’ ज्ञान और अज्ञान, अस्‍तित्‍व और अनस्‍तित्‍व पर ध्‍यान दो। जीवन के विधायक पहलू पर ध्‍यान करो और ध्‍यान को नकारात्‍मक पहलू पर ले जाओ, फिर दोनों को छोड़ दो क्‍योंकि तुम दोनों ही नहीं हो। फिर दोनों को छोड़ सको ताकि तुम हो सको। इसे इस तरह देखो: जन्‍म पर ध्‍यान दो। एक बच्‍चा पैदा हुआ, तुम पैदा हुए। फिर तुम बढ़ते हो, जवान होते हो—इसे पूरे विकास पर ध्‍यान दो। फिर तुम बूढ़े होते हो। और मर जाते हो। बिलकुल आरंभ से, उस क्षण की कल्‍पना करो जब तुम्‍हारे पिता और माता ने तुम्‍हें धारण किया था। और मां के गर्भ में तुमने प्रवेश किया था। बिलकुल पहला कोष्ठ। वहां से अंत तक देखो, जहां तुम्‍हारा शरीर चिता पर जल रहा है। और तुम्‍हारे संबंधी तुम्‍हारे चारों और खड़े है। फिर दोनों को छोड़ दो, वह जो पैदा हुआ और वह जो मरा। वह जो पैदा हुआ और वह जो मरा। फिर दोनों को छोड़ दो और भीतर देखो। वहां तुम हो, जो न कभी पैदा हुआ और न कभी मरा। ‘ज्ञान और अज्ञान, अस्‍तित्‍व और अनस्‍तित्‍व….फिर दोनों को छोड़ दो, ताकि तुम हो सको।’ यह तुम किसी भी विधायक-नकारात्‍मक घटना से कर सके हो। तुम यहां बैठे हो, मैं तुम्‍हारी और देखता हूं। मेरा तुमसे संबंध होता है। जब मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं तो तुम नहीं रहते और मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं हो पाता। फिर संबंध और असंबंध दोनों को छोड़ दो। तुम रिक्‍त हो जाओगे। क्‍योंकि जब तुम ज्ञान और अज्ञान दोनों का त्‍याग कर देते हो तो तुम रिक्‍त हो जाते हो। दो तरह के लोग है। कुछ ज्ञान से भरे है और कुछ अज्ञान से भरे है। ऐसे लोग है जो कहते है कि हम जाने है; उनका अहंकार उनके ज्ञान से बंधा हुआ है। और ऐसे लोग है जो कहते है, ‘हम अज्ञानी है।’वे अपने अज्ञान से भरे हुए है। वे कहते है कि ‘हम अज्ञानी है’, हम कुछ नहीं जानते। एक ज्ञान से बंधा हुआ है और दूसरा अज्ञान से, लेकिन दोनों के पास कुछ है, दोनों कुछ ढो रहे है। ज्ञान और अज्ञान दोनों को हटा दो, ताकि तुम दोनो से अलग हो सको। न अज्ञानी, न ज्ञानी। विधायक और नकारात्‍मक दोनों को हटा दो। फिर तुम कौन हो? अचानक वह ‘कौन’ अचानक वह कौन तुम्‍हारे सामने प्रकट हो जायेगा। तुम उस अद्वैत के प्रति बोधपूर्ण हो जाओगे जो दोनों के पार है। विधायक और नकारात्‍मक दोनों को छोड़कर तुम रिक्‍त हो जाओगे। तुम कुछ भी नहीं रहोगे, न ज्ञानी और न अज्ञानी। घृणा और प्रेम दोनों को छोड़ दो। मित्रता और शत्रुता दोनों को छोड़ दो। और जब दोनों ध्रुव छूट जाते है, तुम रिक्‍त हो जाते हो। और यह मन की एक चाल है। वह छोड़ तो सकता है। लेकिन दोनों को एक साथ नहीं। एक चीज को छोड़ सकता है। तुम अज्ञान को छोड़ सकते हो। फिर तुम ज्ञान से चिपक सकते हो हो। तुम पीड़ा को छोड़ सकते हो। फिर तम सुख को पकड़ लोगे। तुम शत्रुओं को छोड़ दोगे तो मित्र को पकड़ लोगे। और ऐसे लोग भी है जो बिलकुल उलटा करेंगे। वे मित्रों को छोड़कर शत्रुओं को पकड़ लेंगे। प्रेम को छोड़ कर घृणा को पकड़ लेंगे। धन को छोड़कर निर्धनता को पकड़ लेंगे और ज्ञान तथा शास्‍त्रों को छोड़कर अज्ञान से चिपक जाएंगे। ये लोग बड़े त्‍यागी कहलाते है। तुम जो कुछ भी पकड़े हो वे उसे छोड़कर विपरीत को पकड़ लेते है। लेकिन पकड़ते वे भी है। पकड़ ही समस्‍या है। क्‍योंकि यदि तुम कुछ भी पकड़े हो तो तुम रिक्‍त नहीं हो सकते। पकड़ो मत। इस विधि काय हीं संदेश है। किसी भी विधायक या नकारात्‍मक चीज को मत पकड़ो क्‍योंकि न पकड़ने से ही तुम स्‍वयं को खोज पाओगे। तुम तो हो ही, पर पकड़ के कारण छिपे हुए हो। पकड़ छोड़ते ही तुम उघड़ जाओगे। प्रकट हो जाओगे। ओशो विज्ञान भैरव तंत्र, भाग—पांच, प्रवचन-79 साभार:-(oshosatsang.org)
March 27, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र विधि–112 (ओशो)

चौथी विधि: ‘आधारहीन, शाश्‍वत, निश्‍चल आकाश में प्रविष्‍ट होओ।’ इस विधि में आकाश के, स्‍पेस के तीन गुण दिए गए है। 1–आधारहीन: आकाश में कोई आधार नहीं हो सकता। 2–शाश्‍वत: वह कभी समाप्‍त नहीं हो सकता। 3–निश्‍चल: वह सदा ध्‍वनि-रहित व मौन रहता है। इस आकाश में प्रवेश करो। वह तुम्‍हारे भीतर ही है। लेकिन मन सदा आधार खोजता है। मेरे पास लोग आते है और मैं उनसे कहता हूं, ‘आंखें बंद कर के मौन बैठो और कुछ भी मत करो।’ और वे कहते है, हमें कोई अवलंबन दो, सहारा दो। सहारे के लिए कोई मंत्र दो। क्‍योंकि हम खाली बैठ नहीं सकते है। खाली बैठना कठिन है। यदि मैं उन्‍हें कहता हूं कि मैं तुम्‍हें मंत्र दे दूं तो ठीक है। तब वह बहुत खुश होते है। वे उसे दोहराते रहते है। तब सरल है। आधार के रहते तुम कभी रिक्‍त नहीं हो सकते। यही कारण है कि वह सरल है। कुछ न कुछ होना चाहिए। तुम्‍हारे पास करने के लिए कुछ न कुछ होना चाहिए। करते रहने से कर्ता बना रहता है। करते रहने से तुम भरे रहते हो—चाहे तुम ओंकार से भरे हो। ओम से भरे हो, राम से भरे हो। जीसस से, आवमारिया से। किसी भी चीज से—किसी भी चीज से भरे हो, लेकिन तुम भरे हो। तब तुम ठीक रहते हो। मन खालीपन का विरोध करता है। वह सदा किसी चीज से भरा रहना चाहता है। क्‍योंकि जब तक वह भरा है तब तक चल सकता है। यदि वह रिक्‍त हुआ तो समाप्‍त हो जाएगा। रिक्‍तता में तुम अ-मन को उपलब्‍ध हो जाओगे। वही कारण है कि मन आधार की खोज करता है। यदि तुम अंतर-आकाश, इनर स्‍पेस में प्रवेश करना चाहता हो तो आधार मत खोजों। सब सहारे—मंत्र, परमात्‍मा, शास्‍त्र–जो भी तुम्‍हें सहारा देता है वह सब छोड़ दो। यदि तुम्‍हें लगे कि किसी चीज से तुम्‍हें सहारा मिल रहा है तो उसे छोड़ दो और भीतर आ जाओ। आधारहीन। यह भयपूर्ण होगा; तुम भयभीत हो जाओगे। तुम वहां जा रहे हो जहां तुम पूरी तरह खो सकते हो। हो सकता है तुम वापस ही न आओ। क्‍योंकि वहां सब सहारे खो जाएंगे। किनारे से तुम्‍हारा संपर्क छूट जाएगा। और नदी तुम्‍हें कहां ले जाएगी। किसी को पता नहीं। तुम्‍हारा आधार खो सकता है। तुम एक अनंत खाई में गिर सकते हो। इसलिए तुम्‍हें भय पकड़ता है। और तुम आधार खोजने लगते हो। चाहे वह झूठा ही आधार क्‍यों न हो, तुम्‍हें उससे राहत मिलती है। झूठा आधार भी मदद देता है। क्‍योंकि मन को कोई अंतर नहीं पड़ता कि आधार झूठा है या सच्‍चा है, कोई आधार होना चाहिए। एक बार एक व्‍यक्‍ति मेरे पास आया। वह ऐसे घर में रहना था जहां उसे लगता था कि भूत-प्रेत है, और वह बहुत चिंतित था। चिंता के कारण उसका भ्रम बढ़ने लगा। चिंता से वह बीमार पड़ गया, कमजोर हो गया। उसकी पत्‍नी ने कहा, यदि तुम इस घर से जरा रुके तो मैं तो रहीं हूं। उसके बच्‍चों को एक संबंधी के घर भेजना पडा। वह आदमी मेरे पास आया और बोला, अब तो बहुत मुश्‍किल हो गयी है। मैं उन्‍हें साफ-साफ देखता हूं। रात वे चलते है, पूरा घर भूतों से भरा हुआ है। आप मेरी मदद करें। तो मैंने उसे अपना एक चित्र दिया और कहा, इसे ले जाओ। अब उन भूतों से मैं निपट लुंगा। तुम बस आराम करो। और सो जाओ। तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। उनसे मैं निपट लुंगा। उन्‍हें मैं देख लूंगा। अब यह मेरा काम है। और तुम बीच में मत आना। अब तुम्‍हें चिंता नहीं करनी है। वह अगले ही दिन आया और बोला, ‘बड़ी राहत मिली मैं चेन से सोया। आपने तो चमत्‍कार कर दिया।’ और मैंने कुछ भी नहीं किया था। बस एक आधार दिया। आधार से मन भर जाता है। वह खाली न रहा; वहां कोई उसके साथ था। सामान्‍य जीवन में तुम कई झूठे सहारों को पकड़े रहते हो, पर वे मदद करते है। और जब तक तुम स्‍वयं शक्‍तिशाली न हो जाओ, तुम्‍हें उनकी जरूरत रहेगी। इसीलिए में कहता हूं कि यह परम विधि है—कोई आधार नहीं। बुद्ध मृत्‍युशय्या पर थे और आनंद ने उनसे पूछा, ‘आप हमें छोड़कर जा रहे है, अब हम क्‍या करेंगें? हम कैसे उपलब्‍ध होंगे? जब आप ही चले जाएंगे तो हम जन्‍मों-जन्‍मों के अंधकार में भटकते रहेंगे, हमारा मार्गदर्शन करने के लिए कोई भी नहीं रहेगा, प्रकाश तो विदा हो रहा है।’ तो बुद्ध ने कहा,तुम्‍हारे लिए यह अच्‍छा रहेगा। जब मैं नहीं रहूंगा तो तुम अपना प्रकाश स्‍वयं बनोंगे। अकेले चलो, कोई सहारा मत खोजों, क्‍योंकि सहारा ही अंतिम बाधा है। और ऐसा ही हुआ। आनंद संबुद्ध नहीं हुआ था। चालीस वर्ष से वह बुद्ध के साथ था, वह निकटतम शिष्‍य था, बुद्ध की छाया की भांति था, उनके साथ चलता था। उनके साथ रहता था। उनका बुद्ध के साथ सबसे लंबा संबंध था। चालीस वर्ष तक बुद्ध की करूणा उस पर बरसती रही थी। लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। आनंद सदा की भांति आज्ञानी ही रहा। और जिस दिन बुद्ध ने शरीर छोड़ा उसके दूसरे ही दिन आनंद संबुद्ध हो गया—दूसरे ही दिन। वह आधार ही बाधा था। जब बुद्ध ने रहे तो आनंद कोई आधार न खोज सका। यह कठिन है। यदि तुम किसी बुद्ध के साथ रहो वह बुद्ध चला जाए, तो कोई भी तुम्‍हें सहारा नहीं दे सकता। अब कोई भी ऐसा न रहेगा जिसे तुम पकड़ सकोगे। जिसने किसी बुद्ध को पकड़ लिया वह संसार में किसी और को पकड़ पायेगा। यह पूरा संसार खाली होगा। एक बार तुमने किसी बुद्ध के प्रेम और करूणा को जान लिया हो तो कोई प्रेम, कोई करूणा उसकी तुलना नहीं कर सकती। एक बार तुमने उसका स्‍वाद ले लिया तो और कुछ भी स्‍वाद लेने जैसा न रहा। तो चालीस वर्ष में पहली बार आनंद अकेला हुआ। किसी भी सहारे को खोजने का कोई उपाय नहीं था। उसने परम सहारे को जाना था। अब छोटे-छोटे सहारे किसी काम के नहीं, दूसरे ही दिन वह संबुद्ध हो गया। वह निश्‍चित ही आधारहीन, शाश्‍वत निश्‍चल अंतर-आकाश में प्रवेश कर गया होगा। तो स्‍मरण रखो कोई सहारा खोजने का प्रयास मत करो। आधारहीन ही जानो। यदि इस विधि को कहने का प्रयास कर रहे हो तो आधारहीन हो जाओ। यही कृष्‍ण मूर्ति सिखा रहा है। ‘आधारहीन हो जाओ, किसी गुरु को मत पकड़ो, किसी शस्‍त्र को मत पकड़ो। किसी भी चीज को मत पकड़ो।’ सब गुरु यही करते रहे है। हर गुरू का सारा प्रयास ही यह होता हे। कि पहले वह तुम्‍हें अपनी और आकर्षित करे,ताकि तुम उससे जुड़ने लगो। और जब तुम उससे जुड़ने लगते हो, जब तुम उसके निकट और घनिष्ठ होने लगते हो, तब वह जानता है कि पकड़ छुड़ानी होगा। और अब तुम किसी और को नहीं पकड़ सकते—यह बात ही खतम हो गई। तुम किसी और के पास नहीं जा सकते—यह बात असंभव हो गई। तब वह पकड़ को काट डालता है। और अचानक तुम आधारहीन हो जाते हो। शुरू-शुरू में तो बड़ा दुःख होगा। तुम रोओगे और चिल्‍लाओगे और चीखोगे। और तुम्हें लगेगा कि सब कुछ खो गया। तुम दुःख की गहनत्म गहराइयों में गिर जाओगे। लेकिन वहां से व्‍यक्‍ति उठता है, अकेला और आधारहीन। ‘आधारहीन, शाश्‍वत, निश्‍चल आकाश में प्रविष्‍ट होओ।’ उस आकाश को न कोई आदि है न कोई अंत। और वह आकाश पूर्णत: शांत है, वहां कुछ भी नहीं है—कोई आवाज भी नहीं। कोई आवाज भी नहीं। कोई बुलबुला तक नहीं। सब कुछ निश्‍चल है। वह बिंदु तुम्‍हारे ही भीतर है। किसी भी क्षण तुम उससे प्रवेश कर सकते हो। यदि तुममें आधारहीन होने का साहस है तो इसी क्षण तुम उसमें प्रवेश कर सकते हो। द्वार खुला है। निमंत्रण सबके लिए है। लेकिन साहस चाहिए—अकेले होने का, रिक्‍त होने का, मिट जाने का और मरने का। और यदि तुम अपने भीतर आकाश में मिट जाओ तो तुम ऐसे जीवन को पा लोगे जो कभी नहीं मरता, तुम अमृत को उपलब्‍ध हो जाओगे। आज इतना ही। इति शुभमस्तु: ओशो साभार:-(oshosatsang.org)
March 27, 2019

OM Indra’s Airavata In Thailand Flag Rama IV

I have written on the presence of Sanatana Dharma in the South East,Far East, Malaysia, Indonesia, Vietnam , Laos, Cambodia, Korea, Japan, Australia and New Zealand. Another piece of evidence that Sanatana Dharma was present in the South East is that the Secondary flag of the Thai King Rama IV, had the mount of Indra, Chief of Devas,Airavata , white elephant. The flag also had the Hindu sacred symbol OM. ‘King Mongkut (Rama IV) felt the need to create a Royal standard to distinguish his royal barge from other vessels during his many travels around the Kingdom and to fly above the Grand Palace in Bangkok when he is in residence. In 1855 a Royal Standard was created called the ‘Thong Chom Klao’ (ธงจอมเกล้า ‘However the sight of an empty flagpole when the King was not in residence at the palace was considered inauspicious, therefore a second flag was ordered to be hoisted during the King’s absence. This Flag is called the ‘Thong Airapot’ (ธงไอยราพต), the rectangular red flag depicts a mythical three-headed white elephant (Airavata) in full regalia standing on a golden base with a golden pavilion on its back. Within the pavilion is the Thai symbol for Aum or Unalom. The elephant is then flanked on two sides are two seven-tiered Royal Umbrellas.‘ Reference and Citation. https://en.m.wikipedia.org/wiki/Royal_Standard_of_Thailand#Fourth_reign 53.805322 -1.539637
March 27, 2019

Home Remedies in Hindi – 20 घरेलू नुस्खे #2

Home Remedies in Hindi: घरेलू नुस्‍खों (Gharelu Nuskhe) के कोई साइड इफेक्‍ट नहीं होते और आप आसानी से इनका प्रयोग कर सकते हैं. सालों से अपनायी जा रही घरेलू नुस्खे / होम रेमेडीज़ (Home Remedies in Hindi) के बारे में सभी को नही पता. आज हम आपको जो घरेलू नुस्खें बताने जा रहे हैं वो आपकी किचन में बहुत हेल्प करेंगे. Home Remedies in Hindi घरेलू नुस्खे #2 1. चावल को हल्दी लगा कर रख देने से कीड़ा नही लगता. 2. Popcorn कुरकुरा बनाने के लिए, भूनने से एक घंटा पहले मकई पर गर्म पानी छिड़क दे. 3. बरसात में चिप्स, पापड़ आदि फ्रिज में रख दें तो ये कुरकुरे बने रहेंगे. 4. कम समय में स्वादिष्ट चावल पकाने के लिए उसमे थोडा सा सुखा पुदीना डाल दे. 5. अगर हरी सब्जी बासी लग रही हो तो ठन्डे पानी में थोड़ा सा नींबू डालकर 2 घंटे के लिए उसमे रख दे. निकालने पर सब्जी ताज़ी लगेगी. 6. अगर सब्जी में नमक ज्यादा हो गया हो तो, एक बड़ा आलू ( कच्चा ) छील कर उसके दो टुकड़े कर सब्जी में डाल दे. आलू अतरिक्त नमक को सोख लेगा. 7. सूखे गोभी या पत्ता गोभी को उबालते समय लहसुन की 8-10 कलि को बीच से काट कर डालने से गोभी की बदबू ख..

PAURANIK KATHA


March 30, 2019

हम कभी काम पर ध्यान नहीं करते

पुरुष, चार हजार व स्त्री लाख बार सम्भोग से गुजर सकती है: ओशो ——————————————————— कामवासना उठती है हजार बार। थोड़े अनुभव नहीं हैं। एक पुरुष अपने जीवन में, साधारण स्वस्थ पुरुष, चार हजार संभोग कर सकता है, करता है । चार हजार बार काम के अनुभव से गुजरता है एक पुरुष। स्त्री तो लाख बार गुजर सकती है। उसकी क्षमता गहन है। इसलिए पुरुष वेश्याएं नहीं हो सके; स्त्रियां वेश्याएं हो सकीं। लाख बार भी काम के अनुभव से गुजरकर यह पता नहीं चलता कि यह काम-ऊर्जा, यह सेक्स-एनर्जी क्या है? क्योंकि हम कभी काम पर ध्यान नहीं करते कभी हम सेक्स पर मेडिटेशन नहीं करते इस जगत में जो भी ज्ञान उपलब्ध होता है, वह ध्यान से उपलब्ध होता है–जो भी ज्ञान चाहे विज्ञान की प्रयोगशाला में उपलब्ध होता हो; और चाहे योग की अंतःप्रयोगशाला में उपलब्ध होता हो। जो भी ज्ञान जगत में उपलब्ध होता है, वह ध्यान से उपलब्ध होता है। ध्यान ज्ञान को पाने का इंस्ट्रूमेंट, उपाय, विधि, मेथड है । कभी आपने ध्यान किया है सेक्स पर? आप कहेंगे, बहुत बार किया है चिंतन किया है, ध्यान नहीं किया सोचते तो बहुत हैं; जितना करते नहीं, उतना सोचते हैं। काम के अनुभव ..
March 30, 2019

🌞 ग्रीष्म ऋतु ⛱ में आहार-विहार

✊💪स्वस्थ व निरोगी रहने हेतु प्रत्येक ऋतु में उस ऋतु के अनुकूल आहार-विहार करना जरूरी होता है लेकिन ग्रीष्म ऋतु में आहार विहार पर विशेष ध्यान देना पड़ता है क्योंकि इसमें प्राकृतिक रूप से शरीर के पोषण की अपेक्षा शोषण अधिक होता है। अतः उचित आहार-विहार में की गयी लापरवाही हमारे लिए कष्टदायक हो सकती है। शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतु का समय ‘आदानकाल’ होता है।* ग्रीष्म ऋतु इस आदान काल की चरम सीमा होती है। यह समय रूखापन, सूखापन और उष्णता वाला होता है। शरीर का जलीयांश भी कम हो जाता है। पित्त के विदग्ध होने से जठराग्नि मंद हो जाती है, भूख कम लगती है, आहार का पाचन शीघ्रता से नहीं होता। इस ऋतु में दस्त, उलटी, कमजोरी, बेचैनी आदि परेशानियाँ पैदा हो जाती हैं। ऐसे समय में आहार कम लेना व शीतल जल पीना आवश्यक है। स्वास्थ्य-रक्षक, हितकारी और शरीर को स्वस्थ व बलवान बनाये रखने वाले आहार-विहार को पथ्य कहते हैं। प्रत्येक ऋतु में पथ्य आहार-विहार का ही पालन करना चाहिए। 🌞स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्नपानं तदा हितम्। (चरक संहिता)* अर्थात् ग्रीष्मकाल में मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध और तरल पदार्थों का सेवन करना हितका..
March 30, 2019

मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के उपाय

मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए कुछ टिप्स तनाव कम करने और मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए सबसे सरल और उपयोगी ‘शिथिलीकरण’ क्रिया है। प्राकृतिक रूप से हम यह कार्य रात में सोकर पूरा करते है। योग साधना में ‘शिथिलीकरण’ को ‘शव आसन’ कहते हैं, जो निर्जीव स्थिति लाकर आराम कुर्सी , पलंग, गद्दा, जमीन पर चित बैठकर, पीठ के बल लेटकर, हाथ-पैर सीधे रखकर किया जाता है। शरीर के अंगप्रत्यंगों के अलावा मस्तिष्क को भी निष्क्रिय पड़ा रहने देने का अभ्यास करें तथा गहरी निद्रा की मन:स्थिति बनाएं, इस उपाय से पूर्ण शांति मिलेगी। तनाव प्रबंधन के लिए ध्यान यानि मैडिटेशन का भी विशेष महत्व होता है | मानसिक तनाव से मुक्ति पाने के लिए हर हाल में खुश रहने का प्रयास करें। हर तरह की स्थिति का सामना करते हुए अपनी योग्यता में विश्वास जगाए रखें साथ ही मन में कोई घुटन पैदा हो रही हो, तो उसे मन तक ही सीमित न रखें। किसी प्रियजन, विश्वासी मित्र, रिश्तेदार से शेयर करें। इससे आपका मन हलका हो जाएगा। एक साथ यदि कई काम आ जाएं, तो घबराएं नहीं। प्राथमिकता और महत्व के अनुसार एक-एक करके उन्हें निपटाते जाएं। शीघ्र ही आपका बोझ दूर ..
March 29, 2019

गर्मियों में स्लीपर पहनना छोड़ दें…

अद्भुत जानकारी.. गर्मियों में स्लीपर पहनना छोड़ दें… जिन लोगों को पूरे साल (गरमी में भी) घर में स्लीपर पहनने की आदत है, उनसे मेरी सलाह है कि कम से कम गरमी के मौसम में स्लीपर छोड़ दें और अपने पैरों को ज्यादा से ज्यादा जमीन को छूने दें. एक तो पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति हमारे शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है, दूसरे वह चुम्बकीय शक्ति हमारे शरीर के सारे दर्द भी खींच लेने में समर्थ है. साथ ही हमारे शरीर की स्वःउत्पादित बिजली की अर्थिंग भी हो जाती है. और तो और ये भी जान लीजिये की हमारे शरीर की करीब ७००० नसों का एंड पॉइंट भी पगथली पर ही आकर ख़त्म होता है… तो नंगे पैर पैदल चलने से उनसब पर प्रेसर पड़ता है और एक्युप्रेसर का लाभ स्वतः मिल जाता है……. This is very important.Do not wear sleepers at home during summer.It will also keep you cool and save you from high blood pressure. 🕉🌹🌹 Advertisements