Das Mahavidya Kaun Hai – Navratri-Navdurga

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1.बहुरूप, 2.तारा, 3.नर्मदा, 4.यमुना, 5.शांति, 6.वारुणी 7.क्षेमंकरी, 8.ऐन्द्री, 9.वाराही, 10.रणवीरा,
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Das Mahavidya Kaun Hai – Navratri-Navdurga

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नवदुर्गा के इन रहस्यों को शर्तिया आप नहीं जानते होंगे

दस महाविद्याएं कौन हैं?
दस महाविद्याओं में से कुछ देवी अम्बा हैं, तो कुछ सती या पार्वती हैं तो कुछ राजा दक्ष की अन्य पुत्री। हालांकि सभी को माता काली से जोड़कर देखा जाता है। 10 महाविद्याओं के नाम निम्नलिखित हैं- 1. काली, 2. तारा, 3. छिन्नमस्ता, 4. षोडशी, 5. भुवनेश्वरी, 6. त्रिपुरभैरवी, 7. धूमावती, 8. बगलामुखी, 9. मातंगी और 10 कमला। कहीं-कहीं इनके नाम इस क्रम में मिलते हैं- 1. काली, 2. तारा, 3. त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्वरी, 5. छिन्नमस्ता, 6. त्रिपुरभैरवी, 7. धूमावती, 8. बगलामुखी, 9. मातंगी और 10. कमला।
1.काली : इसमें से काली माता को भगवान शंकर की पत्नीं कहा गया है। इन्होंने ही असुर रक्तबीज का वध किया था। इन्हें अम्बा माता की बेटी भी कहा जाता है।
2.तारा : दूसरी माता है तारा जो प्रजापति दक्ष की दूसरी कन्या थी। यह तारा माता शैलपुत्री की बहिन हैं। तारा देवी को हिन्दू, बौद्ध और जैन तीनों की पूजते हैं। यह तांत्रिकों की प्रमुख देवी तारा। (aap https://gyanyog.net par read kar rhe hai)
3.छिन्नमस्ता : यह देवी माता पार्वती का ही एक रूप है। देवी का मस्तक कटा हुए है इसीलिए उनको छिन्नमस्ता कहा गया है। उनके साथ उनकी सहचरणीं जया व विजया हैं। तीनों मिलकर उनके धड़ से निकली रक्त की तीन धाराओं का स्तवन करते हुए दर्शायी गई है।
4.त्रिपुरसुंदरी : इनकी चार भुजा और तीन नेत्र हैं। इसे ललिता, राज राजेश्वरी और त्रिपुर सुंदरी भी कहा जाता है। त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर शिव) की जननी होने से जगदम्बा ही त्रिपुरा हैं। उल्लेखनीय है कि महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियां हैं, जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
5.भुवनेश्वरी : चौदह भुवनों की स्वामिनी मां भुवनेश्वरी शक्ति सृष्टि क्रम में महालक्ष्मी स्वरूपा हैं। सम्पूर्ण जगत के पालन पोषण का दाईत्व इन्हीं भुवनेश्वरी देवी का हैं, परिणाम स्वरूप ये जगत माता तथा जगत धात्री के नाम से भी विख्यात हैं। प्रकृति से सम्बंधित होने के परिणाम स्वरूप, देवी की तुलना मूल प्रकृति से भी की जाती हैं। यही दुर्गम नमक दैत्य के अत्याचारों से लोगों को निजाद दिलाने वाली के कारण ये शाकम्भरी और दुर्गा नाम से भी प्रसिद्ध हुई। काली और भुवनेशी प्रकारांतर से अभेद है काली का लाल वर्ण स्वरूप ही भुवनेश्वरी हैं। देवी के मस्तक पर चंद्रमा शोभायमान है। तीनों लोकों का तारण करने वाली तथा वर देने की मुद्रा अंकुश पाश और अभय मुद्रा धारण करने वाली मां भुवनेश्वरी अपने तेज एवं तीन नेत्रों से युक्त हैं। चौंसठ योगिनियां  kya hai 64 Yogini names in Hindi 64 | Yogini kya hai

6.त्रिपुरभैरवी : नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार यह माता काली का ही स्वरूप है। त्रिपुर का अर्थ तीनों लोक। दुर्गा सप्तशती के अनुसार देवी त्रिपुर भैरवी, महिषासुर नामक दैत्य के वध के काल से सम्बंधित हैं। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता हैं। माता की चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। इन्हें षोडशी भी कहा जाता है। षोडशी को श्रीविद्या भी माना जाता है। ये देवी अपने अन्य नमो से भी प्रसिद्ध है तथा ये सभी सिद्ध योगिनिया हैं:-1.त्रिपुर भैरवी 2.कौलेश भैरवी, 3.रूद्र भैरवी, 4.चैतन्य भैरवी, 5.नित्य भैरवी, 6.भद्र भैरवी, 7.श्मशान भैरवी, 8.सकल सिद्धि भैरवी 9.संपत प्रदा भैरवी 10. कामेश्वरी भैरवी इत्यादि। देवी त्रिपुर भैरवी का घनिष्ठ संबंध ‘काल भैरव’ से है।

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7.धूमावती : सातवीं महाविद्या धूमावती को पार्वती का ही स्वरूप माना गया है। एक बार देवी पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर विराजमान थीं। उन्हें अकस्मात् बहुत भूख लगी और उन्होंने वृषभ-ध्वज पशुपति से कुछ खाने की इच्छा प्रकट की। शिव के द्वारा खाद्य पदार्थ प्रस्तुत करने में विलम्ब होने के कारण क्षुधा पीड़िता पार्वती ने क्रोध से भर कर भगवान शिव को ही निगल लिया। ऐसा करने के फलस्वरूप पार्वती के शरीर से धूम-राशि निस्सृत होने लगी जिस पर भगवान शिव ने अपनी माया द्वारा देवी पार्वती से कहा, धूम्र से व्याप्त शरीर के कारण तुम्हारा एक नाम धूमावती पड़ेगा। (Das Mahavidya Kaun Hai – Navratri-Navdurga ke bare me read kar rhe hai)
एक अन्य कथा के अनुसार महाप्रलय के समय जब सब कुछ नष्ट हो जाता है, स्वयं महाकाल शिव भी अंतर्ध्यान हो जाते हैं, मां धूमावती अकेली खड़ी रहती हैं और काल तथा अंतरिक्ष से परे काल की शक्ति को जताती हैं। उस समय न तो धरती, न ही सूरज, चांद, सितारे रहते हैं। रहता है सिर्फ धुआं और राख- वही चरम ज्ञान है, निराकार- न अच्छा. न बुरा; न शुद्ध, न अशुद्ध; न शुभ, न अशुभ- धुएँ के रूप में अकेली माँ धूमावती. वे अकेली रह जाती हैं, सभी उनका साथ छोड़ जाते हैं. इसलिए अल्प जानकारी रखने वाले लोग उन्हें अशुभ घोषित करते हैं. चौंसठ योगिनियां  kya hai 64 Yogini names in Hindi 64 | Yogini kya hai
8.बगलामुखी : बगलामुखी, दो शब्दों के मेल से बना है, पहला ‘बगला’ तथा दूसरा ‘मुखी’। बगला से अभिप्राय हैं ‘विरूपण का कारण’ और वक या वगुला पक्षी, जिस की क्षमता एक जगह पर अचल खड़े हो शिकार करना है, मुखी से तात्पर्य हैं मुख। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध अलौकिक, पारलौकिक जादुई शक्तिओ से भी हैं, जिसे इंद्रजाल कहा जाता हैं। देवी बगलामुखी, समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय द्वीप में अमूल्य रत्नों से सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान हैं। देवी त्रिनेत्रा हैं, मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती है, पीले शारीरिक वर्ण की है, देवी ने पिला वस्त्र तथा पीले फूलो की माला धारण की हुई है, देवी के अन्य आभूषण भी पीले रंग के ही हैं तथा अमूल्य रत्नो से जड़ित हैं।
9. देवी मातंगी : दस महाविद्याओं में नौवीं देवी मातंगी हैं। हनुमानजी के गुरु मतंग मुनि थे जो मातंग समाज से संबंध रखते थे। देवी का सम्बन्ध प्रकृति, पशु, पक्षियों, जंगलों, वनों, शिकार इत्यादि से हैं तथा जंगल में वास करने वाले वनवासी, आदिवासियों, जनजातियों कि देवी पूजिता हैं। देवी मतंग मुनि के पुत्री के रूप से भी जानी जाती हैं। कालांतर में ये देवी बौद्ध धर्म में मातागिरी नाम से जानी जाने लगी।
10. देवी कमला : श्रीमद भागवत के आठवें स्कन्द में देवी कमला की उत्पत्ति कथा है। दस महाविद्याओं में अंतिम देवी कमला तांत्रिक लक्ष्मी के नाम से भी जानी जाती हैं। देवी कमला, जगत पालन कर्ता भगवान विष्णु की पत्नी हैं। देवताओं तथा दानवों ने मिलकर, अधिक संपन्न होने हेतु समुद्र का मंथन किया, समुद्र मंथन से 18 रत्न प्राप्त हुए, जिनमें देवी लक्ष्मी भी थी, जिन्हें भगवान विष्णु को प्रदान किया गया तथा उन्होंने देवी का पानिग्रहण किया।
देवी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से हैं, इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इंद्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं। उल्लेखनीय है कि श्रीविष्णु ने भृगु की पुत्रीं लक्ष्मी से विवाह किया था।
दीवावली के दिन देवी काली और कमला की पूजा की जाती है। शैव लोग काली की और वैष्णव लोग कमला की पूजा करते हैं। कमला को ही महालक्ष्मी कहा गया है। प्रवृति के अनुसार दस महाविद्या के तीन समूह हैं। पहला:- सौम्य कोटि (त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला), दूसरा:- उग्र कोटि (काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी), तीसरा:- सौम्य-उग्र कोटि (तारा और त्रिपुर भैरवी)।

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2 Comments

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