Kya aap Garud Dev ke Janam ka Rahasya Jante hai

Vishnu, Garud ke rahasya, पक्षी तीर्थ, Aap nahi jante honge Bharat me Garud knha paye jate hai गरूड़ भगवान के बारे में सभी जानते होंगे। यह भगवान विष्णु का वाहन हैं। भगवान गरूड़ को विनायक, गरुत्म
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Kya aap Garud Dev ke Janam ka Rahasya Jante hai

अरुण देवता का विनता के पुत्र और गरुड़ के ज्येष्ठ भ्राता के रूप में उल्लेख हुआ है। पौराणिक कल्पना के अनुसार यह 'पंगु' अर्थात् पाँवरहित हैं। प्राय: सूर्य मंदिरों के सामने अरुण-स्तम्भ स्थापित किया जाता है। इसका भौतिक आधार है, सूर्योदय के पूर्व अरुणिमा (लाली)। इसी के रूपक का नाम 'अरुण' है।

अरुण देवता का विनता के पुत्र और गरुड़ के ज्येष्ठ भ्राता के रूप में उल्लेख हुआ है। पौराणिक कल्पना के अनुसार यह 'पंगु' अर्थात् पाँवरहित हैं। प्राय: सूर्य मंदिरों के सामने अरुण-स्तम्भ स्थापित किया जाता है। इसका भौतिक आधार है, सूर्योदय के पूर्व अरुणिमा (लाली)। इसी के रूपक का नाम 'अरुण' है।

आप सब गरुड़ देव को तो जानते होंगे पर उनके जनम और उनकी माता पिता के बारे में बहुत काम लोग जानते है हम आज उसी विषय पे बात करेंगे ।
अरुण देवता और गरुड़ देवता प्रजापति कश्यप और विनता के पुत्र थे। इनके ज्येष्ठ भ्राता गरुड़ थे, जो कि पक्षियों के राजा थे। अरुण को भगवान सूर्य देव का सारथी माना जाता है। रामायण में प्रसिद्ध सम्पाती और जटायु इन्हीं के पुत्र थे।

अरुण देवता का विनता के पुत्र और गरुड़ के ज्येष्ठ भ्राता के रूप में उल्लेख हुआ है।
पौराणिक कल्पना के अनुसार यह ‘पंगु’ अर्थात् पाँवरहित हैं।
प्राय: सूर्य मंदिरों के सामने अरुण-स्तम्भ स्थापित किया जाता है।
इसका भौतिक आधार है, सूर्योदय के पूर्व अरुणिमा (लाली)। इसी के रूपक का नाम ‘अरुण’ है।

गरूड़ का जन्म सतयुग में हुआ था, लेकिन वे त्रेता और द्वापर में भी देखे गए थे। दक्ष प्रजापति की विनता नामक कन्या का विवाह कश्यप ऋषि के साथ हुआ। विनिता ने प्रसव के दौरान दो अंडे दिए। एक से अरुण का और दूसरे से गरुढ़ का जन्म हुआ। अरुण तो सूर्य के रथ के सारथी बन गए तो गरुड़ ने भगवान विष्णु का वाहन होना स्वीकार किया।

सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे। बचपन में सम्पाती और जटायु ने सूर्य-मंडल को स्पर्श करने के उद्देश्य से लंबी उड़ान भरी। सूर्य के असह्य तेज से व्याकुल होकर जटायु तो बीच से लौट आए, किंतु सम्पाती उड़ते ही गए। सूर्य के निकट पहुंचने पर सूर्य के ताप से सम्पाती के पंख जल गए और वे समुद्र तट पर गिरकर चेतनाशून्य हो गए। चन्द्रमा नामक मुनि ने उन पर दया करके उनका उपचार किया और त्रेता में श्री सीताजी की खोज करने वाले वानरों के दर्शन से पुन: उनके पंख जमने का आशीर्वाद दिया।

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