Ravan ne Bali se Maangi Sahayata

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Ravan ne Bali se Maangi Sahayata

आज हम आप को रावण की एक और हार के बारे में बटकरते है जो राम और रावण युद्ध के दौरान हुए पर राम से भी पहले रावण कितनो से पराजित हुआ | राम रावण युद्ध के दौरान रावण को ऐसा एहसास हुआ की कन्हि वो हार न जाएँ । युध मे एक के बाद एक राक्षस मर रहैं थे । श्रीराम की वानर सेना का जद नुक्सान नहि हो रहा था । देख्ते ही देखते रावन के बहुत से योधा मरते गये। तब रावण के मन में भय का आभास हुआ की युद्ध में उसकी पराजय होगयी तो क्या होगा| उसने मन ही मन अहंकार की भावना व्यक्त करते हुए सोचा, “अरे! मैं तो लोकेश्वर हूं। मुझको कोई हरा नहीं सकता | सभी देवता भी मुझसे डरते है | फिर कोई मेरेको कैसे मार सकता है | रावण अपने अहंकार में साथ को समाज नहीं पा रहा था किसी भी देवता एवं प्राणी में इतनी शक्ति नहीं जो लंकेश्वर का विनाश करने की क्षमता रखता हो। रावण के उस विचार ने उसको टोरी सांत्वना दि पर फिर उसको चिंता सताने लगी की किसी तरह कोई उसको पराजित करने की हालत में पंहुचा दे तो कैसे बचे | लेकिन ऐसा कोई व्यक्ति या कोई राजा कैसे मिलेगा | रावण ने बहुत सोचा और उसको राजा बलि की याद आयी वोही एक मात्र व्यक्ति है जो उसकी सहायता कर सकता है और वो भी राक्षस कुलका है|

रावण तब राजा बलि से मिलने जाने लगा और रावण को याद आया की वो तो इस वक्त ‘सुताल ग्रह’ पर निवास कर रहे होंगे और यदि वह उनसे मिलना चाहता है तो उसे स्वयं वहां जाना होगा। अगले ही पल रावण ने वहां जाने का फैंसला कर लिया।

सुताल लोक रावण पहुंचा तो उसको राजा बलि के द्वार पे भगवान वामनदेव मिले रावण के आगे उन्होंने गदा रखते हुए ‘ना’ का स्वर निकाला उसको वंही पे रोक दिया | रावण को अंदर जाने की आज्ञा नहीं थी |रावण समाज गया की वामनदेव के रहते उसका अंदर जाना मुश्किल है | तब रावण में अपना अकार अपनी माया सकती से बहुत हे छोटा कर लिया और सोचा की इसको कोई देख नहीं पायेगा तो कोई रोके गए भी नहीं | उसने सोचा कि ऐसा करने से वह द्वार के बीचो-बीच बने छोटे से मार्ग से भीतर चला जाएगा। पर जैसे हे रावण अंदर जाने लगा वामनदेव ने अपने पाँव के नीचे दबलिया तब रावण का तो बहुत बुरा हाल होगया उसके चखे निकलने लगी उससे और सहन नहीं होरहा था | किसी प्रकार से बाहर निकलना चाहता था। तब वामनदेव जी ने अपना पाँव हटालिया और उसको अंदर जाने दिया

अंदर जाने के बाद रावण ने राजा बलि को देखा और राजा की जय हो बोलने लगा और कहता की मैं आपके पास एक निवेदन लेने आया हूँ | राजा बलि ने रावण को देख के चकित हुए और उससे अनेका आने का कारण पूछा तो रावण बोला “महाराज। इस पूरे विश्व में ऐसा कोई नहीं जो त्रिलोकेश्वर रावण की रक्षा कर सके। केवल आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं। राजा बलि रावण की बात बहुत धयान से सुनते हुए बीच में हे बोले ” एक बात बताओ रावण तुम भीतर कैसे आए ? किसी ने तुमको द्वार पर रोका नहीं क्या “?

रावण अपने अहंकार में बोलता है की वामनदेव में इतना साहस नहीं की रावण को रोके | लेकिन राजा बलि बोले नहीं लंकेश तुमको रोका तो था पर तुम्हारी दर्द बहरी चेख़ो को सुनके उनको दया आगयी और तुमको अंदर आने दिया तब रावण तोडा हिलगया और क्रोधित होगया बोलै दया वो भी लंकेश पर ऐसा कोई नहीं जो मेरे जैसे सर्वोत्तम देव पर दयावान होने का साहस कर सके। राजा बलि रावण के मुख से ” सर्वोच्च देव! ” सुनते हे बोले रावण क्या कहा तुमने? तुमने देव ऐसा किसने बोल्दिया तुमको | ऐसा कौन सा सर्वोच्च देवता है जो मुझसे मदद मांगने आया है। यदि तुम मुझसे मदद चाहते हो तो सर्वोच्च देव तो मैं ही हुआ।“

रावण अपने आप को बहुत लज्जित महसूस कर रहा था | और राजा बल को बोलै कृपा करके उसकी सहायता करे | राजा बलि बहुत धार्मिक व्यक्ति थे और उन्हों ने तब ध्यान लगाया और देखा की श्री राम अपनी पत्नी सीता को रावण की कैद से बचाने के लिया युद्ध कर रहे है | तो राजा बलि ने राव को बोलै की तुम सीता माता को श्री राम को वापिस कार्डो तो तुम्हारा हिट होगा नहीं तो श्रीराम तुम्हारा वध कर देंगे | और एहि उचित होगा अगर तुम सीता माता को देदो |

इस पर रावण को क्रोध आया और वह बोला नहीं ऐसा नहीं हो सकता सबसे बलवान हूँ मेरे को कोई नहीं मार सकता और मैं क्यों सीता को छोड़ दूं? उसे आज़ाद कराने के लिए कुछ वानर ही तो आए हैं। रावण की मूर्खता पे हस्ते हुए वो राण को बोले की तुम उन्हें वानरों की बात कर रहे हो जिनमे से एक ने तुम्हारे पूरी लंका को अपनी पंच में लगी आग से हे जला दिया , तुम्हारे पूरी लंका के वस्त्र काम परज्ञे उसकी पूँछ को पे बांधने के लिए और एक का तो तुम्हारे महल में हे ऐसे स्थिर होगया की लंका का कोई योद्धा उसका पैर हिला न स्का और ज्ञात करो की वो तो केवल दूत बन के आए थे युद्ध की मंशा से नहीं , युद्ध करते तो क्या होता

“इससे भी बड़ी बात यह है कि तुम्हारा अपना अनुज, विभीषण भी श्रीराम के हित में युद्ध लड़ रहा है। वह तुम्हारे घर का भेदी बनकर तुम्हारे विरुद्ध खड़ा है। इस प्रकार से तुम कभी युद्ध जीत नहीं पाओगे। इसीलिए सीता को श्रीराम को वापस करना ही तुम्हारी भलाई है”। लेकिन रावण मानने के लिए तैयार ही नहीं था जिस पर राजा बलि ने उसकी मदद करने का फैसला किया लेकिन एक शर्त पर।

राजा बलि रावण को एक खुले मैदान में ले गया वंहा पे एक विशाल पर्वत वो भी सोनेका जिसपे हीरे लगे हुए बहुत हे सुन्दर लग रहा था रावण उसको देखता है और उसकी बहुत तारीफ़ करता है राजा बलि बोले जावे इसको अगर तुम उठा पाए तो मैं तुहारी युद्ध में सहायता करुगा रावण ये सुन के बहुत ख़ुश हुआ और उसको उठाने के लिए गया | बहुत प्रयास करने के बाद भी हिला न पाया तब राजा बलि ने खा इसपथ की आकृति देखो किसके समान लगती है तो रावण ने ध्यान से देखा और खा की यह कानो में पहनने वाले कुण्डल के समान | राजा बलि ने बताया की वास्तव में यह हिरण्यरकश्यप की थी | भगवान नृसिंह से युद्ध करते हुए उनकी यह बाली स्वर्गलोक से धरती पर आ गिरी थी। उस जन्म में तुम ही हिरण्यहकश्यप थे। यह तुम्हारी ही बाली थी जिसे तुम पहनते थे और देखो आज तुम इसे उठा भी नहीं पा रहे हो”, रावण को असलियत से रूबरू कराते हुए राजा बलि बोले। वे आगे बोले, “इससे तुम अनुमान लगा सकते हो कि तुम्हारी ताकत कितनी कम हो गई है। उस जन्म में नृसिंह भगवान विष्णु के रूप थे और आज भी विष्णुजी के ही रूप श्रीराम तुम्हारा वध करने आए हैं, और उनसे तुम्हें कोई नहीं बचा सकता।“ इस प्रकार से राजा बलि ने रावण को चेतावनी तो दी लेकिन वह कुछ भी समझ ना सका और चुपचाप वहां से वापस चला गया।

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