March 28, 2019

Twenty four Rishis Meters Devatâs of Gayatri Mantra Details.

Gayatri Mantra is the ultimate among mantras. Gayatri is a Meter, Chandas. Gayatri is the Mother of All Mantras. Smritis declare that no mantra will yield results for one who does not chant Gayatri. Gayatri Mantra was revealed through Sage Viswamitra. People of three dispositions ,Brahmana, Kshatriya and Vaisya are enjoined to Chant it as a part of Sandhya Vandhana , thrice a day. Sandhya Vandhana has the following components, apart from routine rituals like Aachamana and Pranayama. They are, 1.Purification of Speech,Body and Mind. 2.Obesiance to water and purification by it. 3.Thanksgiving to Ten planets and ancestors. 4.Atoning one’s impure actions( by speech, body and mind) 5.Worship of The Sun. 6.Chanting Gayatri. 7.Worshiping Reality ,Brahman. 8.Realising and offering Worship to Sun as the Visible Reality. 9.Offering the result of Sandhya Vandana to Reality, that is non attachment to action performed. While worshipping Sun, Sun is requested to be present. So is Gayatri. Sun is worshipped as Gayatri and Gayatri as Sun. As Gayatri is a Meter, Chandas, (Anushtup), the Anushtup is invoked. Though Gayatri was revealed through Viswamitra,he did not create or invent it. He, along with other Rishis are invoked; Viswamitra is given pride of place. Twenty four Rishis are associated with Gayatri,one Rishi for one syllable of Gayatri Mantra,totalling twenty four. Sinilarly twenty four chandas are referred to , though Gayatri is Anushtup Chandas. We mention only the following Rishis, Chandas and Devatha ,as a token, when we perform Sandhya Vandana dàily. Rishis. Atri, Bhrigu, Kutsa, Vasishta,Gautama, Kasyapa, Angirasa. Chandas. Gayatri, Ushnik Anushtup. Devatâs. Agni, Vaayu, Arga,Vaagesa, Viswe Deva. The twenty four Rishis. (1) Vâma Deva, (2) Attri, (3) Vas’istha, (4) S’ukra, (5) Kanva, (6) Parâs’ara, (7) the very fiery Vis’vamitra, (8) Kapila, (9) S’aunaka, (10) Yâjñavalkya, (11) Bharadvâja, (12) the ascetic Jamadagni, (13) Gautama, (14) Mudgala, (15) Vedavyâsa, (16) Lomas’a, (17) Agastya, (18) Kaus’ika, (19) Vatsya, (20) Pulastya, (21) Mânduka, (22) the ascetic in chief Durvâsâ, (23) Nârada and (24) Kas’yapa. The Chandas, in order. – (1) Gâyatrî, (2) Usnik, (3) Anustup, (4) Brihatî, (5) Pankti, (6) Trisnup, (7) Jagatî, (8) Atijagatî, (9) S’akkarî, (10) Ati S’akkarî, (11) Dhriti, (12) Ati Dhriti, (13) Virât, (14) Prastârapankti, (15) Kriti, (16) Prâkriti, (17) Âkriti, (18) Vikriti, (19) Samkriti, (20) Aksarapankti, (21) Bhuh, (22) Bhuvah, (23) Svah and (24) Jyotismatî. The Devatâs of the several letters in due order, are :– (1) Agni, (2) Prajâpati, (3) Soma, (4) Îs’âna, (5) Savitâ, (6) Âditya, (7) Brihaspati, (8) Maitrâvaruna, (9) Bhagadeva, (10) Aryamâ, (11) Ganes’a, (12) Tvastrâ, (13) Pûsâ, (14) Indrâgnî, (l5) Vâyu, (16) Vâmadeva, (17) Maitrâ varunî (18) Vis’vadeva, (19) Mâtrikâ, (20) Visnu, (21) Vasu, (22) Rudra Deva, (23) Kuvera, and (24) the twin As’vinî Kumâras. Reference and citation. first Chapter of the Tw..
March 28, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र विधि–103 (ओशो)

दूसरी विधि: अपनी संपूर्ण चेतना से कामना के, जानने के आरंभ में ही जानो। इस विधि के संबंध में मूल बात है ‘संपूर्ण चेतना’। यदि तुम किसी भी चीज पर अपनी संपूर्ण चेतना लगा दो तो वह एक रूपांतरणकारी शक्‍ति बन जाएगी। जब भी तुम संपूर्ण होते हो, किसी चीज में भी, तभी रूपांतरण होता है। लेकिन यह कठिन है। क्‍योंकि हम जहां भी है, बस आंशिक ही है। समग्रता में नहीं है। यहां तुम मुझे सुन रहे हो। यह सुनना ही रूपांतरण हो सकता है। यदि तुम समग्रता से सुनो, इस क्षण में अभी और यहीं, यदि सुनना तुम्‍हारी समग्रता हो, तो वह सुनना एक ध्‍यान बन जाएगा। तुम आनंद के अलग ही आयाम में, एक दूसरी ही वास्‍तविकता में प्रवेश कर जाओगे। लेकिन तुम समग्र नहीं हो। मनुष्‍य के मन के साथ यही मुश्‍किल है, वह सदैव आंशिक ही होता है। एक हिस्‍सा सुन रहा है। बाकी हिस्‍से शायद कहीं और हो, या शायद सोए ही हुए हों, या सोच रहे हो कि क्‍या कहा जा रहा है। या भीतर विवाद कर रहे हो। उसमें एक विभाजन पैदा होता है और विभाजन से ऊर्जा का अपव्‍यय होता है। तो जब भी कुछ करो, उसमे अपने पूरे प्राण डाल दो। जब तुम कुछ भी नहीं बचाते, छोटा सा हिस्‍सा भी अलग ..
March 28, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र विधि–104 (ओशो)

तीसरी विधि: ‘हे शक्‍ति, प्रत्‍येक आभास सीमित है, सर्वशक्‍तिमान में विलीन हो रहा है।’ जो कुछ भी हम देखते है सीमित है, जो कुछ भी हम अनुभव करते है सीमित है। सभी आभास सीमित है। लेकिन यदि तुम जाग जाओ तो हर सीमित चीज असीम में विलीन हो रही है। आकाश की और देखो। तुम केवल उसका सीमित भाग देख पाओगे। इसलिए नहीं कि आकाश सीमित है, बल्‍कि इसलिए कि तुम्‍हारी आंखें सीमित है। तुम्‍हारा अवधान सीमित है। लेकिन यदि तुम पहचान सको कि यह सीमा अवधान के कारण है, आंखों के कारण है, आकाश के सीमित होने के कारण नहीं है तो फिर तुम देखोगें कि सीमाएं असीम में विलीन हो रही है। जो कुछ भी हम देखते है वह हमारी दृष्‍टि के कारण ही सीमित हो जाता है। वरना तो अस्‍तित्‍व असीम है। वरना तो सब चीजें एक दूसरे में विलीन हो रही है। हर चीज अपनी सीमाएं खो रही है। हर क्षण लहरें महासागर में विलीन हो रही है। और न किसी को कोई अंत है, न आदि। सभी कुछ शेष सब कुछ भी है। सीमा हमारे द्वारा आरोपित की गई है। यह हमारे कारण है, क्‍योंकि हम अनंत को देख नहीं पाते, इसलिए उसको विभाजित कर देते है। ऐसा हमने हर चीज के साथ किया है। तुम अपने घर के आस-पास ब..
March 27, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र विधि–105 (ओशो)

चौथी विधि ‘सत्‍य में रूप अविभक्‍त है। सर्वव्‍यापी आत्‍मा तथा तुम्‍हारा अपना रूप अविभक्‍त है। दोनों को इसी चेतना से निर्मित जानो।’ ‘सत्‍य में रूप अविभक्‍त है।’ वे विभक्‍ति दिखाई पड़ते है, लेकिन हर रूप दूसरे रूपों के साथ संबंधित है। वह दूसरों के साथ अस्‍तित्‍व में है—बल्‍कि यह कहना अधिक सही होगा कि वह दूसरे रूपों के साथ सह-अस्‍तित्‍व में है—बल्‍कि यह कहना अधिक सही होगा कि वह दूसरे रूपों के साथ सह-अस्‍तित्‍व में है। हमारी वास्‍तविकता एक सह सही अस्‍तित्‍व है। वास्‍तव में यह एक पारस्‍परिक वास्‍तविकता है। पारस्‍परिक आत्मीय ता है। उदाहरण के लिए, जरा सोचो कि तुम इस पृथ्‍वी पर अकेले हो। तुम क्‍या होओगे? पूरी मनुष्‍यता समाप्‍त हो गई हो, तीसरे विश्‍वयुद्ध के बाद तुम्‍हीं अकेले बचे हो—संसार में अकेले, इस विशाल पृथ्‍वी पर अकेले। तुम कौन होओगे? पहली बात तो यह है कि अपने अकेले होने की कल्‍पना करना ही असंभव है। मैं कहता हूं, अपने अकेले होने की कल्‍पना करना ही असंभव है। तुम बार-बार कोशिश करोगे और पाओगे कि कोई साथ ही खड़ा है—तुम्‍हारी पत्‍नी, तुम्‍हारे बच्‍चे, तुम्‍हारे मित्र—क्‍योंकि तुम कल्‍पना ..
March 27, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र विधि–106 (ओशो)

पहली विधि: ‘हर मनुष्‍य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो। अंत: आत्‍मचिंता को त्‍यागकर प्रत्‍येक प्राणी हो जाओ।’ ‘हर मनुष्‍य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो।’ वास्‍तव में ऐसा ही है, पर ऐसा लगता नहीं। अपनी चेतना को तुम अपनी चेतना ही समझते हो। और दूसरों की चेतना को तुम कभी अनुभव नहीं करते। अधिक से अधिक तुम यही सोचते हो कि दूसरे भी चेतन है। ऐसा तुम इसीलिए सोचते हो क्‍योंकि जब तुम चेतन हो तो तुम्‍हारे ही जैसे दूसरे प्राणी भी चेतन होने चाहिए। यह एक तार्किक निष्कर्ष है; तुम्‍हें लगता नहीं कि वे चेतन है। यह ऐसे ही है जैसे जब तुम्‍हें सिर में दर्द होता है तो तुम्‍हें उसका पता चलता है, तुम्‍हें उसका अनुभव होता है। लेकिन यदि किसी दूसरे के सिर में दर्द है तो तुम केवल सोचते हो, दूसरे के सिर-दर्द को तुम अनुभव नहीं कर सकते। तुम केवल सोचते हो कि वह जो कह रहा है सच ही होना चाहिए। और उसे तुम्‍हारे सिर-दर्द जैसा ही कुछ हो रहा होगा। लेकिन तुम उसे अनुभव नहीं कर सकते। अनुभव केवल तभी आ सकता है जब तुम दूसरों कि चेतना के प्रति भी जागरूक हो जाओ, अन्‍यथा यह केवल तार्किक निष्‍पति मात्र ही रहेगी। तुम विश्‍वास कर..

PAURANIK KATHA


February 3, 2018
why ladies use sindoor

हिन्दू महिलाएं मांग में सिंदूर को लगती है vaigyanik or adhyatmik karan

हिन्दू महिलाये मांग में सिंदूर को लगती है । वैज्ञानिक कारण ब्रम्हरनध ओर अधिम नमक मर्म स्थान के ठीक ऊपर सिंधुर लगती है जिसको मांग भी […]